Wednesday, 1 May 2019

"इश्क़ और हक़ीक़त" (ISHQ AUR HAQIQAT)


कुछ बाते है जो तुम्हे बातों ही बातों में समझा दूँगा,
क्या ख्वाब है क्या हक़ीक़त है सब तुम्हे बता दूँगा।।

वो जो पर्दा गिरा मुहोब्बत का,भुला बैठे हो अपनो को,
कौन अपना है तेरा ,कौन पराया, सब तुम्हे बता दूँगा।।

कदर उनकी मिट्टी में मिला रखी है जिनके सिर का ताज हो तुम,
वो काजल कैसे बन जाता है कलंक, शीशे सा साफ तुम्हे
दिखा दूँगा।।

आज कुछ पलभर की खुशी के पीछे घर उजाड़ रहे हो,
कैसे बनते है मकाँ यादों के खंडहर सब तुम्हे दिखा दूँगा।।

आज सब हाथों में है तुम्हारे तो सँभालने से कतरा रहे हो,
कल रेत सा सब मुठ्ठी से फिसल जाएगा सब तुम्हे दिखा दूँगा।।

मेरी माला का वो धागा हो तुम जिसने सब मोतियों को पिरो रखा है,
कैसे बिखरते है टूट कर रिश्ते सब हक़ीक़त में दिखा दूँगा।।

कहीं ज़िद्द तेरी खुशियों की कब्र तक ना ले आये हमें "चौहान",
घर दीये की लौ से कैसे जल जाते है सब तुम्हे दिखा दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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