आज कुछ बिखरी यादें समेट रहा हूँ
कुछ ज़ख्म भरे नही उन्हें कुरेद रहा हूँ।।
माना इन बातों का आज कोई मतलब नही है,
जो ख़्वाब कल देखा था वैसी आज हकीकत नही है।।
तोड़ कर नाता रोज़ अपने आज से जोड़ रहा हूँ,
नकाब खुशियों का हटा चादर गम की ओढ़ रहा हूँ।।
हाँ कुछ रिश्ते आज बस नाम के ही रह गए,
बेवज़ह ही सही आज उन रिश्तों को तोड़ रहा हूँ।।
ये लकीरें तो मेरे हाथ मे कभी थी नही शायद,
फिर क्यों इन हालातों को नाम क़िस्मत का दे छोड़ रहा हुँ।।
एक खुशबू आके रम गई है मेरे जिस्म-ए-पहरान पर,
यही एक वजह है जो मरके भी ये जिस्म नही छोड़ रहा हूँ।।
लिखने पर आया तो लिख डालूँगा तकदीर भी अपनी"चौहान",
तू कभी मिल नही सकता तभी आज लिखना छोड़ रहा हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No word bhai😍😘😘😘
ReplyDeleteThanks bro
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