Wednesday, 15 May 2019

"ऐसा लगता है" (AISA LAGTA HAI)


ऐसा लगता है कि सब कुछ हार कर बैठा हूँ,
ज़िन्दगी बाकी है पर उम्र गुज़ार कर बैठा हूँ।।

वो बचपन वो लड़कपन वो आँगन सब खो गया,
चेहरा भी झूठा है हंसी का नकाब ओढ़ कर बैठा हूँ।।

कम थे पर अच्छे थे रिश्ते नाते वो सारे सच्चे थे,
वक़्त के खेल है रिश्ता खुद से भी बिगाड़ कर बैठा हूँ।।

बेबसी है मेरी पाया कुछ नही खोने को कुछ रहा नही,
एक रूह थी आज वो भी किसी के नाम कर बैठा हूँ।।

रंग बिरंगे फूलों सा  सजा रखा था बगीचा ख्वाबों का मेरे,
खुद अपने हाथों से "चौहान" वो बगीचा उजाड़ कर बैठा हूँ।।



शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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