कैसे बताऊं तुम्हे हाल-ए-दिल ,मुझे बताना नही आता ।।
यूँ तो सब बयां कर देती है मेरी ये खामोश आँखें ,
कैसे बोलूँ एहसासों को अल्फ़ज़ाओं में पिरोना नही आता ।।
हर कही अब तेरा अक्ष दिखाई देता है मुझे ,
कैसे बोलू इस दिल को अब तौर तरीका ज़माने का नही भाता,
तेरी काली ज़ुल्फों की घनी छावं में अब बितानी है रातें मेरी ,
कैसे बोलूँ अब रात का तारों भरा आँचल नही भाता ।।
गम तेरे सारे रख लूंगा समेट के अपने अंदर ,
कैसे बोलूँ तेरे बिन खुशियों से अब नाता समझ नही आता ।।
माना के नहीं पता मुझे तौर तरीका मुहोब्बत करने का ,
कैसे बोलूँ तेरे बिना अब मंज़िल दूर रास्ता भी नज़र नही आता।।
हर्फ़ हर्फ़ लिख देगा "चौहान" अपने जज़्बात खून से ,
कैसे बोलूँ के तेरे बिना मुझे तो जीने का सलीका भी नहीं आता ।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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