एक अकेली तन्हा रात में ,
तेरी यादों को साथ लिये,
देख के उस चाँद को,
अक्ष तेरा ढूंढता हूँ,
अपनी इन आँखों में,
कुछ भीगे जज़्बात लिए।।
ना चाहत दौलत शोहरत की ,
क्या करना महल आटारी का,
खुद को राख बनाना है ,
तेरी रूह में सामने के लिए !!
जाके वहां तुझसे पहले ,
करके रुक्सत इस दुनिया को ,
इश्क़ का सेहरा बांध के बैठा,
तेरे मिलान की चाहत लिए!!
जहाँ न जात-पात की बेड़ी हो,
ना बंधन झुठे इन् रिवाजों के ,
"चौहान" मिटा चला है खुद को ,
कहानी प्रेम मिलन की पूरी करने क लिए !!
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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