आँखों ने पढ़ी आँखों की ये ज़ुबाँ,
मर जायेंगे इक पल भी हुए तुझसे जुदा।।
सांसें जब मिली तेरी सांसों से तो पता चला ,
क्यों रहते थे सदा हम खुद से ही जुदा।।
आज जब नाम लिया तेरा इन लबों ने ,
पता चला के क्यों ख़ामोश रहते थे ये सदा।।
आज जब थामा तेरे हाथों को हाथों में ,
तो पता चला क्या ढूँढती थी ये लकीरें सदा।।
कभी नही देखा था इतना ग़ौर से किसी को,
आज देखा खुद में तो पता था मुझमे ही थे तुम सदा।।
मेरे अलफ़ाज़ रहते थे जुदा-जुदा से खुद मुझसे ही ,
ज़िक्र आया तेरा तो पता चला के क्यों कहता था "चौहान" शायर तुझे जहाँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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