सताएंगी जब रातें तन्हा, तब मांगोंगे हमें ,
रुलायेंगी यादें लम्हा-लम्हा, तब मांगोंगे हमें।।
दिल होगा बेचैन सहमा-सहमा , तब मंगोंगे हमें ।
तड़पाएगा जब ये आलम ये समां , तब मांगोंगे हमें ।।
पाओगे खुद को जब हर कहीं अकेला, तब मांगोंगे हमें ।
मिलेगा जब न कहीं खुशियों का मेला ,तब मंगोंगे हमें।।
आज रहमत थी खुदा की के पास थे हम उनके।
जब ना रहेंगे इस जहाँ में ,तब मंगोंगे हमें।।
जब ना हम होंगे ना मेरी कलम ,तब मांगोंगे हमें ।
जब ना आ सकेगा लौट के "चौहान", तब मंगोंगे हमें।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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