Thursday, 12 September 2019

"वैसी ही तो हो तुम" (VAISI HI TO HO TUM)


जैसी दादी नानी कहानियों में सुनाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।
जो रोज़ रात मेरे ख़्वाबों में आती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

चाँद की चाँदनी, आफताब की चमक,
राग की रागनी, सुरो की गमक,
जो हर शाम ललाट लिए आती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

परियों की शहज़ादी कहुँ, या कोई हूर,
जो उतरी हो आसमान से,
जो हर सावन घटा बन बरस जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

वो पहाड़ो से गिरती नदी हो,
पेड़ो से लिपटी बेल या कोई खिलती हुई कली ,
जिसे देख ये क़ुदरत भी शर्माती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

मेरी कहानी का अंजाम हो,
मेरे रास्तों का मुकाम हो,
जो मेरे जिस्म में रूह सी समा जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

मेरे ख्यालों की परवाज़ हो,
जो मेरे गीतों की आवाज़ हो,
जिसे देख "चौहान" पलभर को सांसे थम जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

जिस जज़्बात को कागज़ तक ना ला सका,
जिस ख्वाब को हकीकत ना बना सका,
जो इश्क़ में नूर-ए-खुदा कही जाती थी,
हाँ सच मे वैसी ही तो हो तुम।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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