Wednesday, 4 September 2019

"जज़्बात और नही" (JAZBAAT AUR NHI)


ये कहानी जज़्बात क्या लिखने लगा,
लोग अपना हमराज़ बनाने लगे है।।

पिरो दूँ उनके दर्द को लफ्ज़ो में मैं ,
इस उम्मीद से हर राज़ बताने लगे है।।

बड़े रंग देख रहा हूँ आजकल इश्क़ के,
हैरत है सच्ची मुहोब्बत दफनाने लगे है।।

अय्याशियों को फिर इश्क़ का नाम देते है,
तोहमत फिर एक दूसरे पर लगाने लगे है।।

कोई किसी के इंतज़ार में मर जाता है,
कही दोस्त दोस्ती का फायदा उठाने लगे है।।

भरोसा तोड़ कर भरोसे की उम्मीद करते है,
असली चहरे अब सबके नज़र आने लगे है।।

कसमे वादे तो आज भी वही पुराने है,
बस मुहोब्बत जिस्मो से निभाने लगे है।।

चंद लफ्ज़ क्या लिख बैठा "चौहान",
जामने वाले तुझे शायर बताने लगे है।।

तेरा लिखा कभी तेरे काम तो ना आया,
ख़्यालात तेरे लोगों के काम आने लगे है।।

पूछते है मुझसे फिर इश्क़-ए-कहानी मेरी,
खैर छोड़ो, हम कौन सा बताने लगे है।।

अब ज़िंदगी मिले या फिर मौत इन रास्तों पर,
आज इन हालतों में खुद को आजमाने लगे है।।

कर लिया है गिरफ्त में अश्क़ बहाती कलम को,
हाँ ,"चौहान" अब लफ्ज़ो को जिंदा दफ़नाने लगे है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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