पत्थर था राह का,
तराश के मूरत किया,
अपनी कला से मुझे,
एक नया रूप दिया,
रास्ते दिखाए जो यहाँ तक आया,
कैसे कह दूँ तुमने मेरे लिये,
कुछ नही किया....
क्या हुआ जो अब हर ,
रास्तों में साथ नही,
क्या हुआ जो अगर अब,
होती रोज़ बात नही,
आपका दिया हौसला था,
"चौहान" इन अंगारों पर,
अकेले चल दिया,
आज जो भी हूँ, जहाँ भी हूँ,
जो रुतबा ,मुकाम है,
सब आपकी बदौलत है,
कैसे कह दूँ तुमने मेरे लिये,
कुछ नही किया....
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Awesome lines
ReplyDeleteThanks 😍😍😍
DeleteThanks 😍😍
ReplyDelete