एक दिन तो हश्र अपना भी ऐसा होना ही था,
इन रास्तों को एक दिन तो अलग होना ही था।।
कहाँ किसे मिला है दुनिया में मुकम्मल जहाँ यहाँ,
महल ख्वाबों का तेरा कभी तो खँडहर होना ही था।।
सब छलावा थे वादे मुहोब्बत के जो किये थे हमनें,
एक दिन तो इन्हें भी टूट के चूर होना ही था।।
बुनियाद कैसी भी हो घर टिकते नही सागर किनारे,
कभी तो इन्हें इन लहरों की आगोश में होना ही था।।
वो तब तलक अच्छा था जब तक तुम्हारे कहने पर था,
कभी तो समझ आती उसे भी बेगाना तो होना ही था।।
वो जिस मिट्टी से बचता फिरता रहा दिन रात,
एक दिन तो "चौहान" उस मिट्टी में ख़ाक होना ही था।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nyc one Bhai
ReplyDeleteThanks bro 😍😍
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