उम्र कम थी और मजबूरियाँ बड़ी,
मुझे वक़्त से सौदा करना ना आया।।
ज़िंदगी माँगी वो मौत बेचकर चला गया,
मुझे हालातों से कभी लड़ना ना आया।।
जिस जीत का जश्न मना रहा था हार थी मेरी,
फर्क कभी मुझे बुरे से बुरे में करना ना आया।।
सफर भी आसान था मेरी मंज़िल भी करीब थी,
किनारे तक आते आते डूब गया तैरना ना आया।।
हर किसी को अपना मान बैठता था कमी थी मेरी,
धोखे मिलते रहे अपनो से कभी धोखा करना ना आया।।
बड़े अच्छे होते है वो लोग जो मरने में बहस नही करते,
ज़िंदगी तिल-तिल मरती रही मुझे मरना भी ना आया।।
कोशिशें करता रहा "चौहान" ताह उम्र हालात लिखने की,
हकीकत में कभी दर्द लफ़्ज़ों में बयां करना ही ना आया।।
लोगों को ना जाने कौन सा अपनापन दिखता रहा नज़्मों में मेरी,
वो महसूस करते रहे मुझे कभी "चौहान" ठीक से पढ़ना भी ना आया।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Very nice.....������
ReplyDeleteThanks 😍😍
DeleteNice lines bro❤️❤️❤️👌
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DeleteTouching lines bhai 😊😊👌👌
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