मैं एक अजनबी चहरे की तलाश में रहता हूँ,
कभी कहीं मिल जाये वो इसी आस में रहता हूँ।।
दर्पण तक जिसके रूप को निहारना चाहता है,
चहरे के नूर से आफताब भी चमक जाता है।।
वो जो कल्पनाओं से परे है अप्सराओं से आगे,
वो जिसे बनाने का नाज़ खुदा खुद उठाता है।।
वो जिसे देख मौसम भी अपना मिज़ाज बदल लेता है,
वो जिसके छूने से हर बाग, गुलिस्तां महक जाता है।।
वो जिसे मैं अक्सर अपने ख्वाबों की हक़ीक़त कहता हूँ,
वो जिसके ज़िक्र से मेरी नज़्म का अंदाज़ बदल जाता है।।
दुवाएँ माँगता हूँ उसे पाने की "चौहान"मंदिर,दरगाहों से,
वो जिसके दिल मे कैद होने की फ़िराक में रहता हूँ।।
मैं एक अजनबी चहरे की तलाश में रहता हूँ,
कभी कहीं मिल जाये वो इसी आस में रहता हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Superb lines 👌👌
ReplyDeleteAwesome ❤️❤️❤️❤️
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