Thursday, 8 August 2019

"बदल गयी" (BADAL GYI)


ना जाने कितनी ही बार ये समझाता हूँ खुद को,
हाँ ये सच है कि बहुत बदल गयी है वो।।

जो एक बार रूठने पर बार बार मानती थी,
आज हक़ीक़त में खुद से संभल गयी है वो।।

जो मेरी छोटी छोटी बातों पर गौर किया करती थी,
आज मेरी बातों को मजाक में बदल गयी है वो।।

कहती तो है आज भी रौशन है मुझपर आफताब की तरह,
पर सच तो ये है कि शाम की तरह ढल गयी है वो।।

कहती है बर्ताव कुछ दिन से ठीक नही है मेरा,
समझना नही चाहती के दूर कितना निकल गयी है वो।।

कोशिश तो बहुत की करीब आने की हमने भी,
साथ तो रही हर रास्तों पर पर मंज़िल बदल गयी वो।।

आज भी कहती है कि हक बस मेरा है उसपर,
आज फिर क्यों  उसके जज़बात ,उसकी ज़ुबाँ बदल गयी है वो।।

अब बस छोड़ दे "चौहान" हर बात को दिल से ना लगा,
समझ जाएगी तो पास भी आएगी क्या हुआ जो दूर निकल गयी वो।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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