Thursday, 1 August 2019

"बेटी का हक" (BETI KA HAK)


आओ सुनाऊँ एक कहानी जो सदियों से देखते आये हो,
सोच है जमाने की सब उनको रिवाज़ बनाते आये हो।।

आज तुम्हे मैं शायद गलत भी लगूँ, पर बाते सच की है,
कहने को ही समान है सब बातें आज यहाँ हक की है।।

बेटी कहाँ अपनी है एक दिन तो पराये घर जाना है,
जो भी करना वही करना जीवन वही तो तुझे बिताना है।।

सबसे बड़ी चिंता है कि तुमपर ये लोग क्या बोलेंगे,
आगे बस वही करना है जो ससुराल वाले बोलेंगे।।

पढ़ना लिखना काम नौकरी सब उसका बेकार गया,
घर की इज़्ज़त बता कर उसको करने से इंकार किया।।

कुछ ख़्वाब अधूरे मायके में जो ससुराल में पूरे करने थे,
कहाँ खबर थी उसको के सब मिट्टी में ही मिलने थे।।

"चौहान" समाज ये सोच का दोगलापन कब छोड़ेगा,
कब बेटे और बेटी को फिर वो एक तराजू तोलेगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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