अब ज़िंदगी निगाहों में खटक रही है,
मंज़िलें खुद इन रास्तों में भटक रही है।।
किस उम्मीद में है ना जाने ये बेले मुझसे,
जो मुझ जैसे सूखे पेड़ से आज भी लिपट रही है।।
खुशियां है कि इस दरवाजे में आने को राजी नही,
गम की दीवारें है जो हर रोज़ हर वक़्त बढ़ रही है।।
नाकामियां ही तो नज़र आ रही है सबको मेरी,
मेरी मेहनत के लहु से सबकी नजर हट रही है।।
अभी तो पनपा भी नही ज़मी से पूरी तरहा,
मुझे उखाड़ फैकने की साज़िशें अभी से चल रही है।।
अब तो साँसों सा ज़रूरी हो गया है लिखना मेरे लिए,
"चौहान" सँजो कर रख दुआ-बदुआ जो भी मिल रही है।।
सब लाश लिए फिर रहे है इस बाजार में अपने ज़मीर की,
इंसानियत है के अब खुदखुशी कर फंदे से लटक रही है ।।
अच्छा किया जो जला कर राख कर दिया उन पन्नो को,
सीख कहाँ आजकल उनमें रोटियां ज़्यादा लिपट रही है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice lines bro
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