मुझसे बिछड़ कर अब कहाँ जाओगे,
अब किसे तुम अपना हमराज़ बनाओगे।।
क्या वही किस्सा पेश करोगे उसके सामने,
या कोई नई कहानी सोची है जो उसे सुनाओगे।।
दो आँसू ज़्यादा बहा देना गर वो गौर ना करे,
हाथों में नमक है जमाने के ज़ख़्म किसे दिखाओगे।।
बड़ा मुहोब्बत में खुदा बनाकर पूजा है तूने मुझे,
अब और कितने पत्थरो को तुम खुदा बनाओगे।।
बड़ी नमाज़े पढ़ी थी तुमने मुझे पाने की खातिर,
अब किसकी चाहत में मस्ज़िद में सिर झुकाओगे।।
माना मैं दरख़्त था जो हिज़रत ना कर सका,
तुम तो परिंद हो पल में वतन बदल जाओगे।।
पर याद रख वो खुला आज़ाद ज़रूर है मगर,
जब पँख थक जाएंगे तो दरख़्त पर ही आओगे।।
हर मोड़ पर तुम्हे मिलेंगे ऐसा तो ज़रूरी नही,
एक रोज़ तुम लौट कर आओगे पर हमें नही पाओगे।।
एक कब्र होगी और मेरी लिखी कुछ किताबें "चौहान",
पछताओगे ,हर लफ्ज़ में जब हमे लिखा पाओगे।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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