Saturday, 3 August 2019

"एक बार फिर" (EK BAAR FIR)


ज़ख़्मो पे एक ओर ज़ख़्म खाने का सोच रहे है,
आज एक बार फिर दिल लगाने का सोच रहे है।।

बड़ी मुश्किलों से संभाला था खुद को हमनें,
एक बार फिर वही ठोकर खाने का सोच रहे है।।

बिखर गए थे एक बार फिर हम काँच की तरह,
आज फिर टूट के बिखर जाने का सोच रहे है।।

यादें किसी कि अब तलक लाश बनकर तैर रही है,
आज फिर किसी की याद में डूब जाने का सोच रहे है।।

नींदों से तो आँखो की ना जाने कबकी अनबन है,
अब एक बार फिर नींदों से लड़ जाने का सोच रहे है।।

ये चाँद सितारे दोस्त है और गवाह भी मेरे हाल के,
आज फिर इनको राज़दार बनाने का सोच रहे है।।

मेरी कलम से निकले अल्फ़ाज़ बयाँ करते है कोई कहानी,
"चौहान" एक और नई कहानी लिखने का सोच रहे है।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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