ज़िंदगी आज भी मेरे जिंदा होने की वज़ह पुछती है,
कहाँ खुशियां अब मेरी चौंखट का पता पुछती है।।
वो बचपन का लड़कपन था हुकुमत हमारी,
कहाँ अब ये दुनिया मुझसे मेरी रज़ा पुछती है।।
हर कोई मुनाफ़ा देखता है रिश्तों के व्यापार में,
कहाँ नियत फिर इस दोगलेपन की वजह पुछती है।।
पैसों में बिक जाते है लोगों के ज़मीर तक यहाँ,
भूख पैसों की कहाँ गुनाहों की सज़ा पुछती है।।
वो नोंच नोंच कर खा जाते है जिस्म आँखों से ही,
दुनिया है कि आज भी कपड़ो में हया ढूंढती है।।
खोदते देखा है मैंने कब्र ईमानदारी को खुद की,
सच्चाई है अपने वजूद का कोई गवाह ढूंढती है।।
घात लगाए बैठा है हर कोई यहां एक दूसरे पर,
खूबियों से मतलब नही दुनिया बस खामियां ढूंढती है।।
बातें इश्क़ मुहोब्बत की ही लिखा कर "चौहान",
सियासती दुनिया है पहले जात-धर्म फिर काम पुछती है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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