Thursday, 24 January 2019

"जब कभी" (JAB KABHI)


जब कभी लिखने बैठूंगा तो हालतों को झंझोड़ दूंगा,
कतरा कतरा जज़बातों का मेरे दिल से निचोड़ दूंगा।।

ये जो तनहाईयाँ आज जकड़े हुए है मेरे दिल को,
ये पाश तेरी यादों का एक ना एक दिन तोड़ दूंगा।।

मिट्टी कर मिट्टी में मिला दूंगा ख़्वाब अपने सारे,
नाता तेरे ख़्वाब सँजोती हुई नींदों से भी तोड़ दूंगा।।

कहीं एक लौ जल रही है तेरे इश्क़ की मेरे दिल में,
राख कर खुद को इसे भी गँगा में बहने को छोड़ दूंगा।।

हक़ीक़त जान ले नाता रूह का था जिस्मो का नही,
दफ़न कर रूह अपनी ये नाता भी तुझसे तोड़ दूँगा।।

आज कदर नही जब लिखता हूँ हर लफ्ज़ तेरी ख़ातिर,
हाल-ए-दिल "चौहान" लफ़्ज़ों में पिरोना भी छोड़ दूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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