आज बात अपनी करते है,
चल शुरू से शुरुआत करते है।।
याद है राज़ दिल का जब तूने खोल था,
मैं बस तुम्हारी हूँ कभी तुमने बोला था।।
तुझे मैंने भी अपनी ज़िंदगी माना था,
ख़्वाब नही तुझे हकीकत जाना था।।
भूल गयी शायद तुम अपनी कही बात,
वो बाहों में बाहें और तन्हाई भरी रात।।
भूल गयी वो हक जो तूने बस मुझे दिया था,
या याद दिलाऊँ तेरे बिना तेरे साथ कितना जिया था।।
हाथ पकड़ पर रोक तो लिया था तुमने,
कभी समझा ही नही फैसला क्यों ये लिया मैंने।।
तेरे साथ तो नही हूँ पर आज भी तेरे पास हूँ,
जीना चाहती है तो जी ले मुझमे मैं एहसास हूँ।।
काश कभी तूने मुझे समझ ही लिया होता,
काश चहरे के साथ दिल भी पढ़ लिया होता।।
कसम तो आज भी याद है जो साथ निभाने की,
तूने भी तो खाई थी कभी दूर ना जाने की।।
साथ मत रहती पर मेरे पास ही रह लेती,
कोई शिकायत थी तो एक दफा कह लेती।।
बस तुझे मेरा नाराज़ होना ही नज़र आया,
पास आना नही हर बार रूठ जाना नज़र आया।।
इश्क़ में ताज महल नही तो नही बना सका,
पर छोटी-छोटी खुशियों का आशियाना नही भाया।।
आज दूर हो गया हूँ तो वजह ढूंढती हो भूलने की,
काश थोड़ी कोशिश कर लेती ना मिलने की।।
आज कहती है शरेआम प्यार का इज़हार करते है,
आज "चौहान" कब्र पर अश्क़ों की बरसात करते है।।
आज बात अपनी करते है,
चल शुरू से शुरुआत करते है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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