कहानी मेरे इश्क़ की आज अधूरी रह गयी,
बातें कुछ बतानी थी जो ज़रूरी रह गयी।।
कभी समझा ना पाया जज़्बात बोलकर ,
वो आज लबों की मेरी ख़ामोशी कह गयी।।
अरमान भी कुछ मेरे यूँ दबकर रह गए,
अश्क़ों के सागर में डूब कर मेरी खुशी बह गयी।।
तलाशने लगा हूँ खुद को आज खुद में मैं,
शायद मेरे जिस्म में मरकर मेरी रूह रह गयी।।
ना जाने किस मंज़िल की तलाश में भटक रहा हूँ,
मंज़िल पाकर भी चाहत मंज़िल पाने की रह गयी।।
अब छोड़ दे "चौहान" झुझना हालातों से अकेले,
लाश अरमानों की दफन मेरी कहानियों में रह गयी।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:
Post a Comment