Monday, 4 December 2017

"मुक़ाम" (MUKAAM)


खुशियां कहाँ अब तो गम भी मेहरबान होगा,
इश्क़-ए-सफ़र में मुक़्क़मल हमें भी मुक़ाम होगा!!

जलता है तो जलता रहे ये जहाँ मेरे दिल का ,
कभी तो यहाँ भी वस्ल-ए-गुल का फ़रमान होगा!!

कभी तो बदलेगी रिवायत-ए-मुहोब्बत तेरे शहर में,
कभी तो यहाँ भी मुहोबत का खुशनुमा अंजाम होगा!!

कब तक बहाता रहेगा "चौहान" लहू अपनी आँखों से ,
कभी तो तेरे इश्क़ में लिपटा हर लम्हा मेरे नाम होगा !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ

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