Thursday, 28 December 2017

"तज़ुर्बा-ए-ज़िंदगी" (TAZURBA-E-ZINDAGI)


ख़ामोशी को लबों पर सजा के रखले ,
मीठा  ज़हर है ज़ुबाँ लोगों की , खुद को बचा के रखले !!

नक़ाबपोश है यहाँ हर कोई ,इस दुनिया के बाजार में ,
दुश्मन अपने बन कर बैठे है , चेहरा तू भी छुपा कर रखले !!

वक़्त आएगा तो साहिल नसीब होंगे तेरी भी कश्ती को ,
बस तूफानों से लड़ कर लहरों की मौज में बहना सिखले !!

विश्वास ना कर यूँ राह में हर किसी मुसाफिर पे ,
रास्ते बहुत मिल जायेंगे बस तू अकेले चलना सीख ले !!

कौन छोटा है यहाँ कौन बड़ा ,ये तो वक़्त बतलायेगा ,
थोड़ा हद्दों में रहना तो "चौहान " अब तू भी सिखले !!

शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम -  दिल की ज़ुबाँ

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