Thursday, 2 January 2020

"हाथों में हाथ" ( HATHO'N ME HATH)


सब ये देख के हैरान है,
हाथों में हाथ हमारे है किसी का,
ज़माना ये ना जाने क्यों परेशान है,
बिन पूछे बिन बोले एक बात सोच बैठे है,
हमारी बातों पर यकीन करेंगे नही,
इसलिए सब अपनी एक कहानी सोच बैठे है,
कोई मुहोब्बत सोच रहा है मेरी,
कोई मुहोब्बत का फ़साना सोच रहा है,
एक आने वाला कल सोच के बैठा है,
कोई मेरा गुज़रा ज़माना सोच रहा है,
मेरे जहन के जज़्बात बहुत अलग है,
ये मुहोब्बत है तो फिर बहुत पाक है,
ये दोस्ती है तो फिर बहुत अज़ीज़ है,
रिश्तों के मायने तो नही समझ आते,
पर जो भी है "चौहान" काबिल-ए-तारीफ़ है,
जमाने को बता कर करना भी क्या है,
समझना दूर कुछ सुनना भी नही चाहते,
हाँ ये भी सच है दोस्ती या मुहोब्बत,
हाथों में हाथ अब देखे नही जाते,
अब भी हया का पर्दा है इस कहानी में,
हर एक किरदार अभी शरेआम नही है,
हाथों में हाथ नही रिश्तों की अहमियत है,
निभाने की कोशिशें है बीच मे छोड़ने नही आते,
जो भी है जैसा है सही है "चौहान"
राज़ कुछ सबके सामने खोले नही जाते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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