Friday, 10 January 2020

"ज़िंदगी के मोड़" ( ZINDGI KE MOD)

ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर आ गयी सब सही सब गलत लगता है,
अब तो रौशनी भी नही भाती, और ये अँधेरा भी चुभता है।।

क्या फैसले करूँ मैं अपने इन तन्हा ज़िंदगी के मुकदमों के,
अब मंज़िल सामने नज़र आती है रास्ता है कि पलभर भी ना कटता है।।

मैं किसी से अब किसी बहस बातों के आलम में भी नही हूँ,
कोई रात को दिन या फिर आग को पानी कहे सब ठीक लगता है।।

मैं कहाँ किसका हमसफ़र बनूँ अब इन तन्हा रास्तो में आखिर,
यहाँ छाव जरूर है मगर मुझे मेरे साये का साथ खलता है।।

एक वक्त था के सबकी दुवाएँ काम आती थी हर मुश्किलों में,
अब तो बस सबका यहाँ सलाह मशवरों से काम चलता है।।

लोग हाल जरूर पूछते है "चौहान" पर मरहम नही बनते,
यहाँ उसकी ही जीत है जो गिरकर फिर खुद संभलता है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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