कोई पूछे तो मैं भी लिखुँ,
आज ये दास्तान-ए-इश्क़।।
क्या होगा आखिर पढ़कर ,
रात भर क़िताब-ए-इश्क़।।
कुछ यादें कुछ जज़्बात होंगे,
रिसता आँखो से पानी इश्क़।।
क्यों जमाने को रास नही,
तेरा मेरा ये रूहानी इश्क़।।
कोई ना जाने कैसा है ये
कही आग कही पानी इश्क़।।
ना मोल-भाव ना नफा-मुनाफ़ा,
तो कहीं है बेइमानी इश्क़।।
कही हकीकत , कहीं फ़साना,
कहीं किस्से कही कहानी इश्क़।।
तुमने भी किया मैंने भी किया,
है ये कोई रीत पुरानी इश्क़।।
ये संसार एक बाज़ार है यहाँ,
होती है रोज़ नुमाइश-ए-इश्क़।।
फिर मैं कैसे कह दूँ के मेरा,
परवर दिगार है मेरा इश्क़।।
अगर मिल ना सके रूह से रूह,
क्या करना जिस्मों का बेज़ान इश्क़।।
क्यूँ समझ ना आये किसी को,
तेरे शहर में ज़ुबाँ-ए-इश्क़।।
लिख तो देता "चौहान" भी,
पानी पर भी पानी से इश्क़।।
कोई बता देता अगर मुझको भी,
क्या होगा मेरा अंज़ाम-ए-इश्क़।।
कोई पूछे तो मैं भी लिखुँ,
आज ये दास्तान-ए-इश्क़।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Kaisa ye ishk hai.. Ajb sa ye ishk hai...
ReplyDelete😍😍😍😍😍
Delete👍👍👍👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌
ReplyDeleteThanks 😍😍
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