ये जो बारिशें आयी है,
क्या तुम लौट आयी हो,
ज़ख्म मेरे भरने लगे है,
अश्क़ मेरे थमने लगे है
क्या तुम लौट आयी हो।।
जज़्बात सोये मेरे फिर जागने लगे है,
ख़्वाब नींदों के पीछे फिर भागने लगे है
इस जिस्म में जान फिर लौट आयी है,
ये जो वीरान सी थी गालियाँ मेरे दिल की,
फिर आज रौनकें नज़र आयी है,
एक फूल सुख गया था बंद किताब में,
आज वही खुशबू लौट आयी है,
ख़्वाब है या हक़ीक़त अब समझ नही,
सच है या झूठ अब क्या कहूँ,
दिल कहता है कि वो लौट आयी है,
होश में बेहोशी सी है,
लफ़्ज़ों में ख़ामोशी सी है,
एक अजब सी खुमारी छाई है,
कशमकश में ना गुज़र जाए ये लम्हा "चौहान",
रोक देना वक़्त मेरे खुदा गर वो लौट आयी है।।
ये जो बारिशें आयी है,
क्या तुम लौट आयी हो,
ज़ख्म मेरे भरने लगे है,
अश्क़ मेरे थमने लगे है
क्या तुम लौट आयी हो।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice 👌👌👌👌
ReplyDeleteThanks 😍😍
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