Saturday, 11 January 2020

"आज भी माँ" (AAJ BHI MAA)


हाँ उम्र में बड़ा हो गया तो क्या,
माँ आज भी मेरी नींदों में सोती है,
मेरी साँस-साँस से वाकिफ है वो,
माँ आज भी मेरी फिक्र में होती है।।

कुछ पल को बाहर क्या चली जाए,
ये घर,घर नही खाली दीवारें होती है,
खरोंच आये जो ज़रा मेरे जिस्म पर,
आज भी उसकी आँखें नम होती है।।

एक अजब सा जादू भी है हाथों में उसके,
माथे पर रखती है सिकन पल में दूर होती है,
ना जाने किस मिट्टी क़ा बनाया है भगवान तूने,
वो अकेली मेरे दुखो में आगे सुखों में पीछे होती है।।

आज माना उसके आँचल से थोड़ा दूर हूँ तो क्या,
दुनिया के इन कामों में थोड़ा मज़बूर हूँ तो क्या,
सब लोग पूछते है यहाँ मुझसे कमाई मेरी,
वो अकेली है जिसे फिक्र मेरी भूख की होती है।।

लिखना तो बहुत कुछ है पर लिखा नही जाता,
तेरे सहारे के बिना कदम एक भी रखा नही जाता,
हर कहीं तो बचकर निकल जाता हूं बुरी बलाओं से,
उनसे लड़ती "चौहान" मेरी माँ की दुआएं होती है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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