Saturday, 27 October 2018

"पापा की परी" (PAPA KI PARI)


सच कहूँ मै वो हूँ जो माँ की कोख से ज़माने से लड़ी हूँ,
कलंक हूँ या लक्ष्मी नही पता पर मैं पापा की परी हूँ।।

काट दिए पँख अरमानों के मेरे ज़माने ने मगर,
पापा की बाँह थाम मैं हर तूफानों से लड़ी हूँ।।

तुलसी आँगन की हूँ या हूँ दाग किसी चुनर की,
गुरुर बन मेरे पापा का सिर पर ताज़ सी सजी हूँ मैं।।

माना समझ नही आता मुझे स्कूली क़िताबों का ज्ञान,
असूलों पर चलकर पापा के मैं ज़माने को पढ़ी हूँ ।।

कई किरदारों को निभाते आयी हूँ मैं अब तलक,
हर एक मुसीबतों से मैं हर वक्त डटकर लड़ी हूँ।।

माँ बनकर पाला भी है,तो पत्नी बनकर संभाला भी है,
बेटी बन प्यार भी किया है तो बहन बनकर लड़ी हूँ।।

चिता अरमानो की जलाई है, राख सपनो की बनाई है,
झूठी दुनिया के रिवाज़ो में ना जाने कितनी बार मरी हूँ।।

सच तो दिखता ही कहाँ है "चौहान" सोच के अंधो को,
नावरातों में कंजक, कोख में मरने वाली पापा की परी हूँ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

  1. Truly commendable sir for acknowledging true emotions ...

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