काफ़िर हो गया हूँ, रास्तों से मुहोब्बत करली,
मंज़िल तक जाने की आस छोड़ दी हमने,
हाँ , अब फर्क नही पड़ता तुमसे तेरी बातों से,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।
सोता कल भी नही था सोता आज भी नही हूँ,
पर जागने की वजह पुरानी छोड़ दी हमने,
चाँद, तारे, तन्हाई, रुसवाई, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।
फिक्र कल भी थी फिक्र तो आज भी है हमें,
पर फिक्र खुद की अब छोड़ दी हमने,
हम मरे ,जिये, मिले, ना मिले, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।
रास्ते अलग चाहते थे तो लो अब अलग ही सही,
अब ज़रुरत हमसफ़र की छोड़ दी हमने,
फूल ,पत्थर, धूप, छाँव, अब फर्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।
जब तलक जो भी लिखा सब जज़्बात थे मेरे,
कहानी लफ़्ज़ों में पिरोनी छोड़ दी हमने,
खून, स्याही, पानी, आसुँ, अब फ़र्क नही पड़ता,
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।
कलमा पढ़े गीता पढ़े या आयात पढ़े वो कुरान की,
बंदगी इंसानों की अब छोड़ दी हमने,
इबादत, सज़दे, दुआ, दवा ,अब फर्क नही पड़ता "चौहान",
अब मुहोब्बत छोड़ दी हमने।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Osm love it
ReplyDeleteThanks
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