कभी हिम्मत ना हुई भेजने की तुम्हें,
ख़त तो रोज़ लिखे थे मैंने तेरे लिए।।
देख ही लेते एक दफा आंखें खोलकर ज़रा,
चोंखट पर थी खुशियां कबसे सवेरे लिए।।
चाँद तारे तो ना ला सके कभी हम इश्क़ में,
रात जुगनुओं से आशियाँ सजाया था तेरे लिए।।
क्या हुआ तुम दिन बन गए और मैं काली अंधेरी रात,
कोशिश तो बहुत की मैंने शाम सा वस्ल होने के लिए।।
मुहोब्बत की आग लगा तुम तो कर गए किनारा हमसे,
एक अरसे जलाया है खुद को राख बनाने के लिए।।
तुझ पत्थर को ना पिंघला पाया कभी "चौहान",
शिद्दत देख तो खुदा खुद ज़मी पर आ गया मुझे लेने के लिए।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice bhai
ReplyDeleteThank you 😍😍
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