मुझसे मेरी कहनी पूछते है लोग,
अल्फ़ाज़ों से नही ,मुँह-ज़ुबानी पूछते है लोग।।
कुछ कहते है कला, कुछ कहते है राज़ है,
जो दिल से हुई थी कभी वो नादानी पूछते है लोग।।
मेरे जज़्बातों में खुद को जीते है, घूँट सब्र का पीते है ,
जो कभी हो ही नही पाई वो मुलाकात रूहानी पूछते है लोग ।।
कुछ ज़ख़्मो का मरहम कहते है , कुछ यादों का संगम कहते है,
मुझसे मेरी इन खामोशियों की कारिस्तानी पूछते है लोग।।
कुछ कहते है दर्द का सैलाब है , कुछ कहते है कल का आफ़ताब है ,
मिटा डाला खुद को जिसके लिए "चौहान" वो चेहरा नूरानी पूछते है लोग ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wahh nere lal...
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