माँ क्या कसूर है मेरा ,
मैं भी तो आना चाहती हूँ इस जहाँ में,
क्या हक नही है मेरा??
माँ मैं एक लड़की हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??
भगवान की बनाई इस दुनियां में,
क्यों नही है फिर मेरा बसेरा??
तू तो कहती थी कि सब एक जैसे है यहाँ,
फिर बेटा-बेटी में क्यों ही फर्क ये तेरा??
क्या मैं एक बेटी हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??
वैसे तो सब कहते है माँ,
बेटी लक्ष्मी का स्वरूप है।।
अपनाना ना चाहे कोई भी,
फिर क्या ये सब झूठ है ??
फिर क्यों नही चाहता कोई ,
के खेले लक्ष्मी उसके घर आंगन में ,
बेटी से क्यों नही भरना चाहता,
खुशियां अपने दामन में,
माँ ये बेबसी तुझे क्यों नज़र ना आती है,
तू भी तो किसी की बेटी है,
तू ये फिर क्यों भूल जाती है??
जिसने जन्म दिया ,जो जन्म देती है ,
जननी वो कहलाती है ,
वो भी तो एक बेटी है ,
दुनिया क्यों ये भूल जाती है ??
जन्म से पहले ही फिर ,
क्यों बेटी मारी जाती है ??
मेरी रगो में भी तो बहता माँ खून है तेरा ,
क्या मैं एक बेटी हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??
कदम तो रखने दे इस दुनियां में ,
तेरे सिर का ताज बन जाऊंगी,
कोई शिकायत ना दूँगी कभी,
जो कहेगी वो कर मैं कर जाऊंगी,
इस जहाँ में पहचान अपनी अलग बनाउंगी,
कलंक ना समझ मुझे अपने माथे का ,
सिर का ताज़ हूँ मैं तेरा ।।
क्या मैं एक बेटी हूँ ,
क्या बस यही कसूर है मेरा??
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Superb job
ReplyDeleteThnks bro
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