Friday, 29 June 2018

"सावन की बारिश" (SAWAN KI BARISH)


अच्छी नही लगती अब वो बूंदे सावन की ,
जिनमें अक्सर हम नहाया करते थे।।

अब वो पानी भी कींचड़ सा लगता है ,
जहां कस्ती कागज़ की चलाया करते थे।।

अब ज़िम्मेदारी है उन स्कूली बस्तों की जगह,
खुद भीग कर उन्हें भीगने से बचाया करते थे।।

इस बेमौसम बारिश में अब वो मज़ा कहाँ,
जो लुफ्त सावन की बारिश में उठाया करते थे।।

अब तो फिक्र सताती है काम पर जाने की उन्हें,
जो कभी बारिश में बेखौफ भीग जाया करते थे।।

अब नही निकलते बाहर खिड़की से हाथ "चौहान",
जो बारिश छूने की चाहत में भीग जाया करते थे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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