ख़ामोश इसलिए नही हूँ की मुझे कुछ छुपाना है,
जो देखकर भी अंधे है उनको कुछ दिखाना है ।।
जो बात करते है लिबाज़ों से इज्ज़त - संस्कार की,
इतना तो बताओ तुम्हारी हवस का कहना तक ठिकाना है।।
अपनी बहन बेटीयों के लिए तो नर्क नज़र आता है मंज़र बाहर का,
बाहर नज़रें ख़ुद ऐसी रखते है के हर ज़िस्म को नोंच-नोंच कर खाना है ।।
बेख़ौफ़ करते है गुनाह धर्म ,जात-पात ,को आड़े लेकर,
दो दिन आवाज़ उठा ख़ामोश हो जायेगें, जानते है किस्सा बहुत पुराना है।।
सज़दे करते है जहां सिर झुकते है कुछ उम्मीद लेकर,
सुना है आज कल तो वहां भी गुनाहों का ठिकाना है ।।
क्या सोचते हो जला के मोमबत्ती ,दे के धरना यहां तुम,
जिनसे उम्मीदें है उनका काम ही तो उठती आवाज़ दबना है ।।
बेख़बर है बिल्ली के सामने बैठे कबूतर की तरह सब,
नही जानते "चौहान" इस आग में राख एक दिन इन्हें भी हो जाना है ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम -दिल की ज़ुबाँ।।

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