Thursday, 7 June 2018

"दिल की गली" (DIL KI GALI)


कभी गली से मेरे दिल की गुज़र कर देखना ,
महक तेरे गेसुओं की सज़ों के रखी है हमने।।

वो दीवार जो कभी खाली खाली सी होती थी ,
आज तस्वीरों से तेरी अब सजा रखी है हमने ।।

हालत बंज़र है इस दिल-ए-मकां की माना पर,
तेरे इंतज़ार में चोंखट दीपों से सजा रखी है हमने।।

क्या फर्क पड़ता है कि क्या हासिल होगा क्या नही ,
मंज़िल तो आ देख अपनी मौत बना रखी है हमने।।

सब पूछते है मुझसे की क्यों है ये तन्हाई ये रुसवाई,
कैसे कहूँ अपने हाथों अपने अरमानों की चिता जला रखी है हमने ।।

परखनी है मुहोब्बत मेरी तो बेबाक आके परखे  वो,
उनके दिए ज़ख़्मो की चादर सीने से लगा रखी है हमने ।।

खुदा भी साथ कैसे देता इस हिमाकत पर मेरी "चौहान",
एक आम-सी  हस्ती अपना खुदा बना रखी है हमने।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।






2 comments:

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...