Friday, 23 October 2020

"कुछ भी तो नही " (KUCH BHI TO NHI)


अब इन तस्वीरों में आखिर क्या ढूंढ रहे हो,
अब वो हँसी, वो खुशी, कुछ भी तो नही है।।

आँखो के नीचे काले गहरे निशान आ गए ,
आँखो में अश्क़ों के सिवा, कुछ भी तो नही है।।

हाँ ये सच है हम कल महफ़िल में मुस्कुरा रहे थे,
सब गम बतला रहे थे बस और कुछ भी तो नही है।।

सब एक दूसरे से उम्मीद में है कि कोई दवा मिले,
पर इश्क़ में ज़ख्मो की दवा, कुछ भी तो नही है।।

ऐसा सफर है जिसकी मंज़िल सोच के सुकून मिलता है,
इन रास्तों में रास्तों के सिवा मिला कुछ भी तो नही है।।

खुद से शिकायतें है हम खुद को कोस कर सो जाते है,
यहाँ तन्हाई के सिवा अब तक मिला कुछ भी तो नही है।।

बात लिखने की है तो बस लिख देता हूँ "चौहान",
बाकी मुझे गिला शिकवा किसी से कुछ भी तो नही है।।

ज़िंदगी ज़िंदगी के सिवा मुझसे छीन भी क्या लेगी,
ज़िंदगी में ज़िंदगी से कभी मिला कुछ भी तो नही है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।
 

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