Tuesday, 14 July 2020

"मेरी ज़िंदगी" (MERI ZINDAGI)



एक तेरे बाद क्यूँ यूँ बर्बाद सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।

हर रात नए ख़्वाब सँजोते थे तेरे संग जीने के,
बस नाम तेरा ही लिखा दिल के हर कोने पे,
आज तन्हा काली रात सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।

सदियों से लिखते आ रहे है जिंदगी के पन्नों पर,
कोई मरहम ना असर करे अब मेरे इन ज़ख्मो पर,
किसी पुराने फ़टे लिबाज़ सी हो गयी है जिंदगी,
किसी पुरानी बंद क़िताब सी हो गयी है जिंदगी।।

कोई राह नज़र आये तो चला भी जाऊँ,
यूँ मर मर कर कितना जीता जाऊँ,
अमावस में ग्रहण लगे महताब सी हो गयी है ज़िंदगी।।
किसी पुरानी बंद किताब सी हो गयी है जिंदगी।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

1 comment:

  1. एक बंद कमरे में बैठ हमने तुम्हारी किताब को पढ़ा था,
    खुद को रोक बंद कमरे में मैंने अपनी धड़कनों को सूना था।

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