Wednesday, 1 July 2020

"बद्तमीज़ कलमकार" (BATMEEZ KALAMKAAR)



हम पहले ही उन ख्यालो से निकल नही पा रहे,
तुम हमसे यूँ बार बार एक वही बात मत किया करो।।


बड़े कमज़ोर है, मिट्टी के ये आशियाने हमारे साहब!!,
हमसे यूँ बार - बार बरसात की बात मत किया करो।।


हम खुश है हमारी इस छोटी बस्ती, छोटे मकानों में ही,
महलों के ख्वाब दिखा हमारी ज़मीने मत लिया करो।।


छोटी छोटी बातों में ही ख़ुशी ढूंढ लेते है ज़िंदगी की ,
बड़ी खुशियों के ये झूठे वादे हमसे ना किया करो।।


हम गरीबों का क्या है अगर हम मर भी गए तो,
आप बड़े लोग हो साहब,ज़िंदगी चैन से जिया करो।।


हुकूमत आपकी है जो दिल आये आप वो किया करो,
निशाना साधने को सहारा हमारे कंधों का ना लिया करो।।


ग़रीबो की ज़िंदगी का कोई मोल थोड़ी होता है साहब,
हम मरे चाहे जिये आप तो बस सियासत किया करो।।


थोड़ी बदतमीज़ है कलम चौहान की "हक़ीक़त" लिखती है,
मुझसे यूँ झूठी कामियाबी के किस्से लिखने की उम्मीद ना किया करो।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

3 comments:


  1. बड़े कमज़ोर है, मिट्टी के ये आशियाने हमारे साहब!!,
    हमसे यूँ बार - बार बरसात की बात मत किया करो... Bhut badhiya yrrr🥰🥰

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  2. Last ending amazing 😊👌👌👌👌👌

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