Saturday, 11 July 2020

"तज़ुर्बा -ए-ज़िन्दगी-3" (TAZURBA-E-ZINDAGI-3)



ये जो रियासतें बना रखी है तुमने इश्क़ में, ख़्याल रखो,
कोई मिला के उन्हें साम्राज्य तुम्हारा ना उजाड़ दे।।

माना हुक़ूमते है तुम्हारी पर थोड़ा प्रजा का भी ख़्याल करो,
वक़्त से पहले कहीं राज्यभार से ये प्रजा ही ना लताड़ दे।।

यकीन कर पर इतना भी नही के सच को देख अनदेखा कर दो,
ये खेल सियासती है कहीं छूरा पीठ में अपने ही ना मार दे।।

तुम शातिर ,बलवान,होशियार ,पर ये घमंड किस बात का,
वक़्त पर कही इस दौड़ में तुम्हे लँगड़े ना पछाड़ दे।।

उड़ान ऊँची रख पर इतनी के ज़मी नज़र आती रहे,
हालातों के बिगड जाने पर पैर आसमाँ नही तलाशते।।

तू जैसा है ठीक है किसी को देख कर मत बदल,
टूट जाने पर तो भगवान भी मंदिर में नही रखे जाते।।

जो रंग भरे तसवीर में तेरी उनको सँजो के रख,
कुछ के हिस्से में "चौहान" ये रंग भी नही आते।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

3 comments:

  1. यकीन कर पर इतना भी नही के सच को देख अनदेखा कर दो,
    ये खेल सियासती है कहीं छूरा पीठ में अपने ही ना मार दे। Ek no bhai ek.no ♥️♥️♥️😘😘🌹🌹🌹🌹🌹

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  2. 👌👌👌👌♥️❤️👌👌👌✍️✍️

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