नशे के अँधेरे में आज हस्ती अपनी मैं मिटा बैठा,
दो पल की ख़ुशी ख़ातिर, खुशियाँ अपनो की जला बैठा।।
कुछ ख्वाब मेरे थे तो कुछ मेरे अपनो के मुझे लेकर,
उम्मीद अपनो की तो मैं आज महकदे में डूबा बैठा।।
कभी बस आदतन थी आज ज़रुरत बन बैठी है मेरी,
इस ज़रुरत के पीछे तो मैं क्या कुछ ना लुटा बैठा।।
वो जिसने काबिल बनाया मुझे अपने पैरों पे खड़ा कर,
इज्ज़त मिला मिट्टी में उसकी,आंखे उसको दिखा बैठा।।
वो जो पर्दा गिराती रही हमेशा मेरी नादानियों पर,
आज हाथ अपना शान से उसी पर उठा बैठा।।
किसे पता था कफन खुद अपना सिल रहा हूँ मैं,
कब्र खोद अपनी आज खुद उसी कब्र में जा बैठा।।
वो आंखे देखती रही रास्ता घर आने का मेरे,
क्या कहूँ कि कैसे उन्हें ज़िंदा लाश मैं बना बैठा।।
एक अच्छा खासा खुशियों का संसार था मेरा,
महकदे के नशे मैं "चौहान" उसे नर्क बना बैठा।।
जो सोचते रहे कि उनका अभिमान बनके दिखाऊंगा मैं,
आज उनके गुरुर को ख़ाक कर मिट्टी में मिला बैठा।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Katil 👌
ReplyDeleteThanks 😍😍😍
DeleteNice👌👌
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