Saturday, 15 June 2019

"अच्छा होता" ( ACCHA HOTA)


हम अज़नबी ही रह जाते तो अच्छा होता,
तुम्हे अपने करीब ही ना लाते तो अच्छा होता।।

क्या हुआ गर एक दो मुलाकात हो भी गयी तो,
ये वक़्त की साज़िश समझ जाते तो अच्छा होता।।

समझ तो हम पहले ही गए थे इरादे तुम्हारे,
इस नादाँ दिल को भी समझा पाते तो अच्छा होता।।

बात दोस्ती तक थी वो भी चलो अच्छा ही था,
इस दोस्ती को प्यार ना बनाते तो अच्छा होता।।

अनजानी राहो पर चले थे जिनका कोई मुक़ाम ना था,
तुम्हे मंज़िल ही ना बनाते तो अच्छा होता ।।

मैं और मेरी कलम बनती रही खामोशियों की ज़ुबाँ,
कभी ये कलम ही ना उठाते तो अच्छा होता।।

जिसे जो समझा जो माना वो तो काबिल ही ना था,
पत्थरों को खुदा ना बनाते तो अच्छा होता।।

इस आस में मर गया "चौहान" के थोड़ी राहत मिलेगी गम से तेरे,
तुम कब्र पर आ कर मेरी, ये अश्क़ ना बहाते तो अच्छा होता।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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