Thursday, 6 June 2019

"अपने ही तो थे" ( APNE HI TO THE)


आज गैरों के है तो क्या हुआ,कभी अपने ही तो थे,
आज टूट के बिखर गए तो क्या,सब सपने ही तो थे।।

कब उसने कसमे खाई थी उम्र भर साथ निभाने की,
धागे कच्चे थे रिश्तों के एक रोज़ टूटने ही तो थे।।

कैसे करता पलटवार, बचाव में दिल-ए-शीशमहल के,
जो पत्थर मार रहे थे वो लोग अपने ही तो थे।।

इलाज होता कोई तो भी गवारा नही होता मुझको,
जो ज़ख्मो को नासूर कर गए अपने ही तो थे।।

हर कोई डूबा ही है यहाँ कोई किनारे तो कोई लहरों में,
अज़नबी रास्तो के मुसाफ़िर थे एक रोज़ थमने ही तो थे।।

आते भी तो कितने ,लबों तक अश्क़, आँखो से बहकर,
एक रोज़ तो सुखकर निशान चहरे पर जमने ही तो थे।।

सब पता है फिर भी गौर से सुनता हूँ तेरी इस कहानी का अंजाम,
की कब तू बोले,दो आज़ाद परिंदे थे "चौहान" ,मुहोब्बत के पिंजरे में मरने ही तो थे।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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