Tuesday, 4 June 2019

"ईद मुबारक" (EID MUBARAK)


तू दीवाली पर मिठाई खा लेना,
मैं ईद पर सेवइयां खा लूँगा,
धर्म की बात नहीं बात इंसानियत की है,
तू मुझे गले लगा लेना मैं तुझे लगा लूँगा।।

ये सियासती खेल है जो धर्म जात-पात बना बैठी,
तुझे मुझसे लड़ा बैठी, मुझे तुझसे लड़ा बैठी,
वरना फ़र्क ही क्या है मुझमे तुझमे,
तू मंदिर चुनरी चढ़ा देना,मैं दरग़ाह चादर चढ़ा दूँगा।।

फर्क ही क्या है रोज़े है या नवराते,
भूखा इबादत में तू भी है मैं भी,
बात तो खुदा,भगवान को मनाने की है,
तू मेरे व्रत खुला देना, मैं तेरा इफ़्तार करा दूँगा।।

छोड़ जमाना क्या कहता है ,
चाँद वही है ईद का भी करवाचौथ का भी,
जात परिंदों की रख "चौहान",
मंदिर पर सिर तू झुका लेना, मस्ज़िद पर सज़दा मैं कर लूंगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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