Sunday, 9 June 2019

"दर्द की दास्तां" (DARD KI DASTAAN)


आओ उसके दर्द का कुछ एहसास आज तुम भी करलो,
तुम्हरी अपनी नही तो क्या ,बेटी समझ के आंखे भरलो।।

जिस दर्द से वो गुज़री है इस नन्ही सी उम्र में,
हिम्मत है तो आज उसके दर्द की दास्तां ही सुनलो।।

अभी तो वो हुस्न भी नही था,वो जिस्म भी नही था,
हवस के अंधो थोड़ा तो उम्र का भी लिहाज़ करलो।।

तड़पी होगी रोई होगी ना जाने कितना चिल्लाईं होगी,
आधे जिस्म की बेटी को कैसे वो माँ देख पाई होगी।।

जिस्म तो आखिर जिस्म है हिंदू का हो या मुसलमान का,
ऐसी हैवानियत ओर फिर क्यों ज़ोर चला ना अल्लाह भगवान का।।

सड़के भी आज खाली है ना दिखा कुछ अखबारों में,
सिसयाती खेल है सब अस्मत लूट रही है बाज़ारों में।।

सब कहने की बाते है कि नारी का सम्मान करो,
आज के हालात है "बेटी बचाओ" का नारां छोड़ो "भ्रूण हत्या" का सम्मान करो।।

तिल तिल करके मरने से अच्छा ,वो दुनिया मे ही ना आये,
इतना दर्द सहने से अच्छा वो कोख में ही मर जाये।।

छोड़ "चौहान" समाजी बातें हमपर कौन सा गुज़री है,
कहाँ कहाँ घूमेगा तक अब तू इंसानियत की लाश उठाये।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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