मैं बातें इश्क़ की करूँ, हक़ीक़त की करूँ या किसी के हक की करूँ,
ये मेरा ईमान है किसी बाज़ार में चंद कागज़ के टुकड़ों पर नही बिकता।।
तुम्हे गुरुर दिखता होग मुझमे ,क्योंकि कभी खुद में नही झाँकते,
दिये की रौशनी सबको नज़र आती है उसके तले अँधेरा किसी को नही दिखता।।
अच्छी थी वो घनी छाव उस राह पर गुज़रने वाले हर राहगीरों के लिए,
जो खुद को उस आग में तपा कर छाव तुम्हे देता रहा, उस दरख़्त का सहारा नही दिखता।।
कभी ज़िक्र आया मेरी नज़्म में तेरा ,तो भुलाना मुश्किल हो जाऊँगा मैं,
आज बड़ी बेरुखी से कहती हो के "चौहान" तू कभी मेरे बारे में नही लिखता।।
मैं अच्छा तब तलक लगूँगा तुम्हे, जब तक तेरे हक में बोलता रहूँगा,
बात साफ है मुहोब्बत में चाँद तो दिखता है पर उसमे दाग नही दिखता।।
इतना भी गुरुर ना कर अपने हुस्न पर, बस कुछ दिन की कहानी है,
ये मिट्टी है मिट्टी में मिल जायेगा, हर उम्र में ये जिस्म एक जैसा नही दिखता।।
किसको समझाने निकल पड़ा "चौहान" सब नशे में है झूठी शानो-शौकत के,
ये सावन के अंधे है , इनको रंग कोई क़ुदरत का दूसरा नही दिखता।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

👌👌👌
ReplyDeleteThanks 😍😍
DeleteTrue lines bro 👌👌 ❤️❤️
ReplyDeleteThanks bro 😍😍
DeleteMst
ReplyDeleteThanks 😍😍
Delete