Tuesday, 6 November 2018

"दिवाली" (DIWALI)


अपने पराये वैर द्वेष में आज कहीं गुम हो गयी,
वो दीपों वाली दीवाली ना जाने कहाँ खो गयी।।

अब वो एक दूजे के घर उपहार लेकर नही जाते,
रिश्तों की अहमीयत मैं की आग में राख हो गयी।।

बनवटी खुशियाँ नज़र आती है अब हर चहरे पर,
बधाई दीवाली की तो लगता है मज़ाक हो गयी ।।

वो इंतज़ार भी नही होता महीने भर से दीवाली का,
पटाखों का जश्न भी अब प्रदूषण वाली बात हो गयी।।

सजाते है घर आज कल वो कई तरहा की लाईटें लगा कर,
वो खुशबू मिटी के दिये कि ना जाने कहाँ खो गयी।।

कहाँ अब वो पहले जैसा बात बाकी है "चौहान",
त्यौहार तो आज कल बस दिखावे की बात हो गयी।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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