अब नही सोती वो वक़्त पर रातों को शायद ,
ख़्याल उसको अब नींद का आया ना होगा।।
मुहोब्बत समझ आने लगी है अब उनको शायद,
मेरी तरह किसी ने हर-पल उसे रुलाया ना होगा।।
अब शायद कोई सहारा भी मिल गया होगा,
उस कस्ती को शायद किनारा भी मिल गया होगा।।
शायद अब वो मेरी फिक्र में बेचैन नही होती,
शायद अब वो मेरी बात से खफा हो अकेले में नही रोती।।
शायद अब उसे बार-बार मेरा फिक्र करना सताता ना होगा,
शायद अब बात किसी की सुन कर चहरा मेरा याद आता ना होगा।।
उसकी महफ़िल में तो कभी कमी ही ना थी मेहमानों की,
शायद तभी रुठ कर जाना मेरा याद उसे आया ना होगा।।
लिखने बोलने से तो कहाँ नफरत हुई होगी उसे "चौहान",
याद कर शायद तेरा लिखना सुनना ही उसे भाया ना होगा।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice one bhai.... Keep it up....
ReplyDeleteThnku superman 😍😍
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