ये बारिश सावन की रुलाये मुझको ,
ये भीगी भीगी बूंदे जलाए मुझको।।
बिखरे मुझपर यादें बनकर तेरी ये तो,
रोकूँ कैसे इनको रोक ना पाऊं खुद को।।
आँखों से निकले ये हाथोँ पर भी ना ठहरें,
हाल-ए-दिल अपना, अपना मैं सुनाऊँ किसको।।
भीगा के मुझको अब तो एहसास ये ऐसा दिलाये,
बहाने बारिश के जैसे मैं सीने से लगाऊं तुझको।।
मरहम है या ज़हर है समझ में ही ना आये मुझे,
जला बूंदों से "चौहान", ये ठंडी हवाओं से बुझाये मुझको।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice one
ReplyDeleteThank you
ReplyDelete